बर्फीले तूफान में अरुणिमा ने कृत्रिम पैर के सहारे अंटार्कटिका चोटी फतह की, शान से फहराया झंडा

अगर हौसले बुलंद हो तो बड़ी से बड़ी मुश्किलें, तो सबसे बड़ी मुश्किलें भी आपके सामने घुटने टेकने की देती हैं। इसका एक उदाहरण पर्वतारोही अरुणिमा सिन्हा की कहानी है।अरुणिमा एक ट्रेन दुर्घटना में अपना पैर खो चुकी हैं, लेकिन उनके बावदूज उन्होंने ने हार नहीं मानी और आगे बढ़ती रहीं। एक पैर गंवाकर अरुणिमा ने हाल ही में अंटार्कटिका की सबसे ऊंची चोटी को फतह करने का रिकॉर्ड अपने नाम कर लिया।

-45 डिग्री बर्फीले तूफान में अरुणिमा ने कृत्रिम पैर के सहारे अंटार्कटिका चोटी फतह की, शान से फहराया झंडा

आपको जानकर हैरानी होगी कि अरुणिमा ने -40 से -45 डिग्री सेल्सियस में हिम्मत नहीं हारी और तेज बर्फीले तूफान से लड़ने का रिकॉर्ड बनाया। आपको बता दें कि उन्होंने इसे केवल ऑक्सीजन की मदद से हासिल किया है। अरुणिमा ने गुरुवार को अंटार्कटिका की सबसे ऊंची चोटी माउंट विंसन को फतह किया और गुरुवार को 12 बजकर 27 मिनट पर अंटार्कटिका के सबसे ऊंची चोटी पर तिरंगा झंडा भी फहराया।

अरुणिमा ने ट्वीटर के जरिए इस बारे में जानकारी दी है। पीएम मोदी  ने अरुणिमा  सिन्हा को सफलता के नए शिखर को छूने के लिए बधाई दे चुके हैं। पीएम मोदी ने कहा कि वह भारत की गौरव हैं, जिन्होंने अपनी मेहनत और लगन के कारण यह मुकाम हासिल किया है। मैं उनके प्रयासों के लिए भविष्य में ढेर सारी शुभकामनाएं देता हूं। अरुणिमा ने पीएम मोदी का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि जब देश के प्रधान मंत्री एक नागरिक के रूप में इतने समर्पित होते हैं, तो हमें भी अपने-अपने क्षेत्रों में देश का नाम नई ऊंचाई पर ले जाने का सपना देखना चाहिए। भारतीय खिलाड़ियों की ओर से, हम उनके लिए बनाई गई नीतियों और सम्मानों के लिए आभार व्यक्त करते हैं। जय हिंद।

अंटार्कटिका की जिस चोटी पर अरुणिमा पहुंची वहां पहुंचना बेहद मुश्किल है, यह कोई आसान काम नहीं है। वह भी एक पैर के साथ जो काम उन्होंने किया है वह वाकई बेमिसाल है। अरुणिमा जिस मुकाम पर पहुंची हैं, वह आसान नहीं है। सुनने में भी अविश्वसनीय लगने वाले इस कारनामे को अंजाम देने वाली वह दुनिया की पहली महिला दिव्यांग पर्वतारोही बन गई हैं।

अरुणिमा का जन्म उत्तर प्रदेश के अंबेडकर नगर जिले में हुआ है। वह वॉलीबॉल खिलाड़ी भी हैं। वह सेना में जाना चाहती थी, 2011 में दिल्ली जाते वक्त एक ट्रेन हादसे में उनके पैर कट गए और ख्वाब अधूरा ही रह गया। इसके बाद उनकी जिंदगी में मानों अंधेरा छा गया। लेकिन मैंने हार नहीं मानी और लंबे इलाज के बाद मैं फिर से उठी। मैंने पर्वतारोहण का सपना देखा है और माउंटेनमॉर्निंग स्कूल में दाखिला लिया है। इसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। उन्होंने किलिमंजारो (अफ्रीका), एल्ब्रुस (रूस), कास्टेन पिरामिड (इंडोनेशिया), किजाश्को जैसी चोटियां पर विजय प्राप्त की

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